गुर्जर शब्द वैसे तो संस्कृत का शब्द है। जिसका अर्थ 'शत्रु का नाश करने वाला' अर्थात 'शत्रु विनाशक' होता है...लेकिन गुर्जर नाम में ही शेर ही की दहाड़ है। और इस दहाड़ के आगे कोई टिक नहीं पाता है। चाहे कोई कितना भी कुछ भी क्यों न कर लें, गुर्जरो के महापुरुषों को छिनने की लाख कोशिश क्यों न हो... लेकिन गुर्जर अपना हक मांग कर नहीं, छिन लेता है.. फिर चाहे मिहिर भोज हो या पृथ्वीराज चौहान या फिर राजस्थान में गुर्जर आरक्षण ही क्यों न हो..
गुर्जर कभी झुकता नहीं है वो सामने वाले को झुका कर ही दम लेता है। आज हम आपको गुर्जर समाज के महापुरुषों के बारे बताएँगे। जिन्होंने आन बान शान के लिए अपने प्राणों को क़ुर्बान कर दिया लेकिन आखिरी वक्त तक बब्बर शेर की तरह लड़ते लड़ते अपना नाम अमर कर दिया।
वैसै अगर देखा जाए तो इस वीर गुर्जर जाति मे अनेकों महापुरुषों ने जन्म लिया है जैसे गायत्री माता, जो ब्रह्मा जी की अर्धांग्नी रही। नन्द बाबा, जो भगवान कृष्ण के पालनकर्ता रहे, माता राधा.. जो जाति से जैसी गुर्जरी थी, जो भगवान कृष्ण की संगिनी रही। वही सवाई भोज जैसे वीर पैदा हुए, जिन्होंने अपने वचनों के लिए रानी जयन्ती को अपना शीष काट के दे दिया, साडू माता जैसी गुर्जरी पैदा हुई, भगवान देव नारायण ने कमल पुष्प में अवतार लिया और साडू माता की झोली में आकर खेल।
महापुरुषों की कड़ी में सबसे पहला नाम आता है राजा मिहिर भोज का... जो भारत के एक महान प्रतापी राजा थे, इनका सम्राज्य मुल्तान से लेकर बंगाल तक था और उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में कर्नाटक तक था। मिहिर भोज भगवान विष्णु जी के भक्त थे।
अब बात करेंगे माँ पन्ना धाय की जिनके बलिदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता हैं। कहते हैं... "माॅ पन्ना धाय के बिन,शून्य गाथा राजस्थान की, चढ़ा भेट वीर गुर्जर को,दी कीमत उदय की जान की"। पन्ना धाय एक गुजरी थी। उन्होंने मेवाड़ के भावी राणा उदय सिंह की जानकारी बचाने के लिए अपने पुत्र की कुर्बानी दी।
पन्ना धाय के बाद बारी आती विजय सिंह पथिक की जिनका असली नाम भूप सिंह गुर्जर था। विजय सिंह पाथिक का जन्म उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के गुलावठी गांव में हुआ था। 1915 में लाहौर षड्यंत्र मामले में भूप सिंह का नाम आने के बाद उनके घरवालो ने उनका नाम बदल कर विजय सिंह पथिक कर दिया। विजय सिंह पथिक ने देश की आजादी में योगदान दिया था। विजय सिंह पथिक एक स्वतंत्रता सेनानी के साथ साथ एक कवि, लेखक और पत्रकार भी थे।
जहां विजय सिंह पाथिक ने देश की आजादी में अहम योगदान दिया वहीं धन सिंह गुर्जर ने अंग्रेजों के खिलाफ आवाज बुलंद की थी। धन सिंह गुर्जर का जन्म 1820 को मेरठ के पांचाली गांव में हुआ था। 10 मई 1857 को मेरठ से आजादी की पहली लड़ाई की शुरुआत हुई। उस समय धन सिंह मेरठ में कोतवाल के पद पर तैनात थे। उन्होंने ही उस ऐतिहासिक पहली लड़ाई का आगाज किया था। उनके नेतृत्व में विद्रोही सैनिकों ने अग्रेजों के विरुद्ध जो कदम उठाया। वह चिंगारी देश में अंग्रेजों के खिलाफ आग के रूप में फ़ैल गई थी। धन सिंह के नेतृत्व में क्रांतिकारी भीड़ ने ‘मारो फिरंगी’ का नारा बुलंद करते हुए अंग्रेजों का कत्लेआम करना शुरू कर दिया था।
अब बात भारत के लौह पुरुष "सरदार वल्लभ भाई पटेल" की.. सरदार वल्लभ भाई पटेल जैसे महापुरुष एक गुर्जर थे। उन्होंने ने भारत की लड़ाई में बढ़-चढ़कर योगदान दिया था। सरदार वल्लभ भाई पटेल ने आजाद भारत की लड़ाई के लिए गुर्जर समुदाय को प्रेरित किया। आजाद भारत की लडाई के लिए गुर्जर समुदाय के हजारों बच्चों ने अपने प्राणों की आहुति दें दी। आजादी के लिए गुर्जरों का कहर इस कदर बढ़ गया था कि अंग्रेजों ने उन्हें बागी घोषित कर दिया था। इस वजह से ही गुर्जर समुदाय के लोगों को जंगल और देहाती इलाकों में जाकर रहना पड़ा। इसी का परिणाम है कि गुर्जर समाज के लोग पढ़ाई लिखाई से वंचित रह गए।
देखा जाए तो देश की खातिर इस वीर गुर्जर जाति ने लाखों कुर्बानियां दी है। कुछ सामने है तो कुछ गुमनामी की के अंधेरे में है। लेकिन जब जब गुर्जर दहाड़ता है तो बब्बर शेर से कम नहीं लगता है।
https://youtu.be/-JDTC9G8Fz8
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